ग्राउंड जीरो पर बिहार में कोरोना से दहशत

ग्राउंड जीरो पर बिहार में कोरोना से दहशत

बरौनी रिफाइनरी में पेट्रोलियम मंत्री को कोविड अस्पताल के लिए देना चाहिए निर्देश

चर्चित बिहार :-  पिछले दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 100 वेंटीलेटर दिए जाने की मांग रखी, लेकिन क्या ऐसा नही लगता कि बिहार की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थिति में सौ वेंटिलेटर ऊंट के मुंह में जीरा का फोरन साबित होंगे । बिहार के 38 जिलों के सभी सदर अस्पतालों में अगर 10 – 10 वेंटिलेटर की व्यवस्था भी की जाए तो 380 वेंटिलेटर कम से कम होने चाहिए। साथ ही बिहार के तमाम मेडिकल कॉलेज और पटना के बड़े अस्पतालों को भी जांच किट और वेंटिलेटर की दरकार है। बिहार में ग्रामीण इलाकों में न कायदे से आइसोलेशन सेंटर बन रहे है, ना कोरोंटाइन किया जा रहा है।

साधारण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तो बात छोड़िए ,रेफरल अस्पताल और सदर अस्पताल की हालत नाजुक है । पिछले साल मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार में बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था देश देख चुका है। एसकेएमसीएच मुजफ्फरपुर में सैकड़ों बच्चे काल के गाल में समाते रहे और हम कुछ नही कर पाए। चमकी बुखार सिर्फ मुजफ्फरपुर की समस्या है, लेकिन कोरोना एक वैश्विक महामारी है, जिसमें बिहार सरकार की प्लानिंग नगण्य दिखती है। एक मुजफ्फरपुर को संभाल पाना जब इतना कठिन रहा तो फिर बिहार के 38 जिलों के बाशिंदों की रक्षा किसके सहारे होगी ?
अब सवाल बड़ा मौजू है कि आखिर प्लानिंग इतनी देर से क्यों ? क्या ऐसा नहीं लगता कि नीतीश जी ने प्रधानमंत्री जी से वेंटिलेटर समेत अन्य सुविधाएं मांगने में बहुत देर कर दी और सवाल यह भी उठता है कि अगर वेंटीलेटर पर्याप्त संख्या में मिल भी जाए तो उसे संचालित करने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ज़िले स्तर पर बिहार में मौजूद है क्या। क्या ऐसा नहीं लगता कि इसके लिए एक गंभीर योजना पहले होनी चाहिए थी।

नीतीश जी पेशे से इंजीनियर हैं । भारत सरकार के कई महकमों की ज़िम्मेदारी संभाल चुके हैं । बिहार सरकार में 5 बार मुख्यमंत्री रहे हैं । 15 साल से राज्य के वजीरे आला हैं । शासन का लंबा तजुर्बा है उनके पास। फिर प्लानिंग करने में इतनी देर कैसे हो गई मुख्यमंत्री जी ? भारत सरकार से कोआर्डिनेशन करके एक महीने पहले इन तमाम चीजों की जरूरत को समझ जाना चाहिए था । और क्या सिर्फ भारत सरकार के भरोसे ही बिहार सरकार जनता की तकदीर लिखना चाहती है ? बिहार को अपनी व्यवस्था अलग से नहीं चलानी चाहिए क्या ?

केरल ,ओडिशा,यूपी और बंगाल से भी थोड़ा सीखने की ज़रूरत है। ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन बाबू क्या सिर्फ केंद्र के भरोसे ही अपनी सियासत चमकाते हैं ? बिहार के ही कई चर्चित नौकरशाहों ने नवीन बाबू के पूरे तंत्र की कमान संभाल रखी है। बिहार के ब्यूरोक्रेट दिल्ली समेत देश भर में आकर बढ़िया काम करते हैं ,जबकि बिहार विकास में फिसड्डी क्यों हो जाते हैं ? क्या इसके लिए सियासी उहापोह ज़िम्मेदार तो नही है।

नीतीश जी को एनडीए गठबंधन में सीटों की छीना झपटी करनी होती है तो झटपट दबाब बनाकर 17 सीटें झटक लेते हैं। लेकिन बिहार में कोरोना से लड़ने के लिए उपकरण मांगने में इतनी देर लग गयी ?

बिहार आने वाले मजदूरों को नीतीश जी बिहार की सीमा में नहीं घुसने देने का एलान करते हैं। ये बयान कोरोना की भयावहता के मद्देनजर ठीक हो सकते हैं लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से बयान हैरानी पैदा करते हैं। जिस दुल्हन को मायके में सम्मान नहीं मिलेगा ,उसे भला ससुराल वाले अपनी सर आंखों पर बिठाएंगे क्या ? राज्य के राजा को दिल्ली के मुख्यमंत्री से बातचीत करके तमाम मजदूरों के खाने-पीने की व्यवस्था और दिल्ली में ही उन्हें रोकने की योजना बनानी थी। हालांकि बिहार सूचना केंद्र ने खाने पीने की व्यवस्था बाद में दिल्ली में कई स्थानों पर कर दी। लेकिन तीन दिनों तक बिहार यूपी जाने के नाम पर ,जो बबेला खड़ा हुआ। उससे कहीं न कहीं बिहार की छवि खराब हुई है। अब सवाल ये भी उठता है कि आखिर बिहार के लिए बस खुलने की अफवाह किसने उड़ाई ? बुद्धि और साहस में पूरी दुनिया भर में अपना लोहा मनवाने वाले बिहारियों का लोग इस प्रकरण में उपहास उड़ा रहे हैं।

मधेपुरा,सहरसा,सुपौल समेत बिहार के दर्ज़नो ज़िले ऐसे हैं,जहां आईसीयू और वेंटिलेटर नही हैं। कोसी,सीमांचल,रोहतास ,मिथिलांचल के नेपाल से सटे क्षेत्रों और चंपारण के अंतिम छोर पर बसे वाशिंदों के मन मे भारी भय का माहौल है । इन इलाकों से पटना की दूरी 400 से 500 किलोमीटर के आसपास होगी। अगर उपरोक्त इलाकों में कोरोना का प्रकोप बढ़ता है तो पटना आते आते मरीज की सेहत बिगड़ने के आसार ज़्यादा होंगे और ख़ुदा न खास्ता मरीज रास्ते मे दम तोड़ देते हैं,तो फिर बीमारी के फैलने का अनुपात कई गुणा बढ़ सकता है।

ग्रामीण स्तर पर जागरूकता का भी बिहार में नितांत अभाव खटकता है और स्वास्थ्य व्यवस्था लगभग चरमराई हुई है। कोरोना से बचाव के लिए जागरूकता के लिए ठोस पहल नही हो पा रही है। कई ज़िलों से शाम में हाट बाजार में भारी भीड़ की सूचना आती रहती है,जो बिहार में लॉकडाउन की पोल खोल रहा है।

वेंटिलेटर और आईसीयू की चिंता पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है, तमाम निजी नर्सिंग होम को कोरोना मरीज के इलाज सुनिश्चित करने के निर्देश देना। भले ही उसका भुगतान बिहार सरकार को क्यों न करना पड़े। इस मामले में ओडिशा सरकार से बिहार सीख सकता है। ओडिशा ने राज्य के कई बड़े निजी अस्पतालों को टेक ओवर किया है,जिसे सरकारी सहायता के ज़रिए संचालित किया जा रहा है। ओडिशा सरकार इस प्रयोग को अब छोटे शहरों तक ले जा रही है ताकि ग्रामीण कोरोना पीड़ितों को भी बेहतरीन सुविधा मुहैया कराई जा सके ।

कोलकाता में भी कलकत्ता मेडिकल कॉलेज समेत कई अस्पतालों का अधिग्रहण कोरोना अस्पताल के लिए किया गया है । साथ ही कोलकाता के कई स्टेडियम आइसोलेशन सेंटर में तब्दील किए गए हैं। पटना में भी मोइनुल हक स्टेडियम, एन कॉलेज ,बीएन कॉलेज ,श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल ,ज्ञान भवन और बापू सभागार समेत कई बड़े स्थानों को चिन्हित कर आइसोलेशन सेंटर बनाया जा सकता है और आईजीएमएस ,पीएमसीएच ,नालंदा मेडिकल कॉलेज समेत तमाम निजी अस्पतालों को कोरोना अस्पताल में तब्दील कर सकते हैं।

बिहार में कई ऐसे साधन संपन्न जिले हैं ,जिन्हें नोडल ज़िला चिन्हित कर आसपास के 5 जिलों के लिए इलाज की मुकम्मल व्यवस्था की जा सकती है। ऐसा करना बिहार सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है लेकिन बहुत मुश्किल नहीं है।

बेगूसराय उत्तर बिहार की औद्योगिक राजधानी है ,जहां पर रिफाइनरी अस्पताल, एचएफसी अस्पताल, रेलवे अस्पताल, एनटीपीसी अस्पताल ,आयुर्वेदिक कॉलेज और सदर अस्पताल समेत कई सरकारी अस्पताल मौजूद हैं, जहां वेंटीलेटर और आईसीयू की सैकड़ों की संख्या में व्यवस्था करके उत्तर बिहार के मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण सेंटर बनाया जा सकता है । बेगूसराय में कई ऐसे निजी नर्सिंग होम हैं, जहां आईसीयू वेंटीलेटर की सुविधा मौजूद है। बिहार सरकार चाहे तो इन निजी नर्सिंग होम या अस्पतालों की सुविधा लेकर अगल-बगल के 15 जिले के लोगों की जान बचाई जा सकती है। बेगूसराय के अग्रसेन मातृ सेवा सदन ने आइसोलेशन वार्ड के लिए अस्पताल की सुविधा जनता के लिए प्रदान कर दी है।

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अगर चाहें तो बेगूसराय के बरौनी रिफाइनरी को सीएसआर फण्ड से 200 बेड के कोविद अस्पताल बनाने के निर्देश दे सकते हैं। राज्य और केंद्र दोनो मिलकर ओडिशा में ये प्रयोग बखूबी कर रहे हैं। बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत देखकर ऐसे प्रयोग की सख्त जरूरत है,जो न सिर्फ बेगूसराय के लिए बल्कि सम्पूर्ण उत्तर बिहार की जीवन रेखा साबित हो सकते हैं।

जमुई,शेखपुरा,लखीसराय,समस्तीपुर,खगड़िया,सहरसा,मधेपुरा,सुपौल,अररिया,पूर्णिया और कटिहार तक के मरीज सामान्य दिनों में बेहतर इलाज के लिए बेगूसराय आते रहे हैं। अगर उपरोक्त अस्पतालों को एक्टिवेट करा लिया जाए तो इन जिलों के मरीज़ो को ज़िंदगी मिल सकती है।
लेकिन बिहार सरकार को पुरुषार्थ दिखाना होगा। सत्ता और विपक्ष की दीवार को गिराना होगा,तभी बिहार बचेगा। जब बिहार बचेगा ,तभी न सत्ता और विपक्ष की सियासत होगी। बिहार नहीं बचा तो राजा और प्रजा दोनों की राजनीति कैसे चलेगी ?
मानना होगा कि सत्ता अगर शरीर है तो विपक्ष सदन और राज्य की आत्मा होती है। इसलिए कोरोना महामारी में सबको साथ आकर बिहार को उबारना होगा। आने वाला समय बिहार के लिए बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण हो सकती है ,जिसकी गूंज देर से सुनाई पड़ने के आसार हैं। अगर समय के साथ चौकसी बरती गई तो कोरोना से बिहार आसानी से उबर भी सकता है।
बिहार में जांच की सुविधा भी कायदे से बहाल नही हो पाई है। मरीज का अनुपात भी बढ़ता जा रहा है,ऐसे में एक अलग कोविड अस्पताल की भारी ज़रूरत है।

राजेश राज
( लेखक डीडी न्यूज़ दिल्ली में पॉलिटिकल जर्नलिस्ट हैं )