हरितालिका तीज व्रत : क्या हैं व्रत के नियम और महत्व, क्या करें और क्या ना करें महिलाएं… जानें

चर्चित बिहार भाद्र शुक्ल पक्ष तृतीया बुधवार को है. सुहागिनों के महापर्व के रूप में प्रचलित हरतालिका व्रत तीज का प्रसिद्ध पर्व 12 सितंबर, बुधवार को मनाया जायेगा. तृतीया शाम के 6:36 मिनट उपरांत चतुर्थी चित्रा नक्षत्र रात्रि 04:48 तक, शुक्ल योग उपरांत ब्रह्मयोग तैतिल करण का योग रहेगा. दरअसल, भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन का विशेष महत्व है.

क्या है हरितालिका तीज व्रत 

भाद्रेमासि सिते पक्षे तृतीयाहस्तसंयुता तदनुष्ठान मात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते।।

सौभाग्यवती स्त्रियां अपने अखंड सौभाग्य के लिए एवं कन्याएं अपने भावी जीवन में सुयोग्य जीवनसाथी मिलने की कामना से इस कठिन व्रत को श्रद्धा विश्वास के साथ पूर्ण करेंगी. हरतालिका तीज व्रत निराहार और निर्जला किया जाता है. मान्यता है कि इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए किया था. हरतालिका तीज व्रत करने से महिलाओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है. अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को कुंवारी लड़कियां भी रख सकती हैं, क्योंकि मान्यता है कि मां पार्वती ने इस व्रत को शिवजी को पति रूप में पाने के लिए किया था. इस व्रत में मां भगवान शिव और मां पार्वती का पूजन किया जाता है.

हरतालिका तीज व्रत के नियम

हरतालिका तीज व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है. व्रत के बाद अगले दिन जल ग्रहण करने का विधान है. हरतालिका तीज व्रत करने पर इसे छोड़ा नहीं जाता है. प्रत्येक वर्ष इस व्रत को विधि-विधान से करना चाहिए. हरतालिका तीज व्रत के दिन-रात जागरण किया जाता है. रात में भजन-कीर्तन करना चाहिए. हरतालिका तीज व्रत कुंवारी कन्या, सौभाग्यवती स्त्रियां करती हैं. शास्त्रों में विधवा महिलाओं को भी यह व्रत रखने की आज्ञा है.

हरतालिका तीज के व्रत की पूजन विधि

हरतालिका तीज प्रदोषकाल में किया जाता है. सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है. यह दिन और रात के मिलन का समय होता है. हरतालिका पूजन के लिए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की बालू रेत और काली मिट्टी की प्रतिमा हाथों से बनाएं. पूजा स्थल को फूलों से सजाकर एक चौकी रखें और उस चौकी पर केले के पत्ते रखकर भगवान शंकर, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें. इसके बाद देवताओं का आह्वान करते हुए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश का षोडशोपचार पूजन करें. सुहाग की पिटारी में सुहाग की सारी वस्तु रखकर माता पार्वती को चढ़ाना इस व्रत की मुख्य परंपरा है. इसमें शिव जी को धोती और अंगोछा चढ़ाया जाता है. यह सुहाग सामग्री सास के चरण स्पर्श करने के बाद ब्राह्मणी और ब्राह्मण को दान देना चाहिए. इस प्रकार पूजन के बाद कथा सुनें और रात्रि जागरण करें. आरती के बाद सुबह माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाएं और ककड़ी-हलवे का भोग लगाकर व्रत खोलें.

हरतालिका व्रत की पूजा सामग्री 

बेलपत्र, शमी पत्र, केले का पत्ता, धतूरे का फल एवं फूल, अकांव का फूल, तुलसी, मंजरी, जनैव, नाडा, वस्त्र, सभी प्रकार के फल एवं फूल पत्ते, फुलहरा (प्राकृतिक फूलों से सजा ).

हरतालिका तीज व्रत का पौराणिक महत्व

हरतालिका तीज व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. एक पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान भोलेनाथ को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था. हिमालय पर गंगा नदी के तट पर माता पार्वती ने भूखे-प्यासे रहकर तपस्या की. माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता हिमालय बेहद दुखी हुए. एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वती जी के विवाह का प्रस्ताव लेकर आये, लेकिन जब माता पार्वती को इस बात का पता चला तो, वे विलाप करने लगी. एक सखी के पूछने पर उन्होंने बताया कि वे भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप कर रही हैं. इसके बाद अपनी सखी की सलाह पर माता पार्वती वन में चली गयी और भगवान शिव की आराधना में लीन हो गयी. इस दौरान भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन हस्त नक्षत्र में माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की आराधना में मग्न होकर रात्रि जागरण किया. माता पार्वती के कठोर तप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिये और पार्वतीजी की इच्छानुसार उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया. उसके बाद से अच्छे पति की कामना और पति की दीर्घायु के लिए कुंवारी कन्या और सौभाग्यवती स्त्रियां हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं और भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं.

हरितालिका तीज में क्या न करें

हरितालिका तीज के दिन महिलाओं को इस दिन क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. इस व्रत का यह नियम है कि इसे एक बार प्रारंभ करने पर हर साल पूरे नियम से किया जाता है. महिलाएं एकत्रित होकर रतजगा करती हैं और भजन कीर्तन पूरे रात तक करती रहती हैं. महिलाएं इस दिन बिल्कुल भी पानी ग्रहण नहीं करती हैं. इस व्रत में सुबह स्नान के बाद भगवान शिव-पार्वती की पूजा का महत्व है. पूरे दिन भजन गाया जाता है और हरतालिका व्रत की कथा सुनाई जाती है. कुछ राज्यों में महिलाएं पार्वतीजी की पूजा करने के पश्चात लाल मिट्टी से स्नान करती हैं. मान्यता के मुताबिक ऐसा करने से महिलाएं पूरी तरह से शुद्ध मानी जाती हैं.

अखंड सौभाग्य की कामना के लिए हरतालिका व्रत 

अखंड सौभाग्य की कामना के लिए महिलाएं और युवतियां अच्छे वर के लिए हरितालिका तीज का व्रत रखती हैं. इस दौरान नयी दुल्हनें अपने मायके में झूला झूलती हैं और सखियों से अपने पिया और उनके प्रेम की बातों का रस लेती हैं. प्रेम के बंधन को मजबूत करने के लिए यह व्रत रखती हैं. इस दिन हरी-हरी चूड़ियां, हरे वस्त्र और मेहंदी का विशेष महत्व है. मेहंदी सुहाग का प्रतीक है. इसकी शीतल तासीर प्रेम और उमंग को संतुलित करती है. इसलिए इस दिन महिलाएं मेहंदी जरूर लगाती हैं. ऐसा माना जाता है कि मेहंदी भावना को नियंत्रित करता है. हरियाली तीज का नियम है कि क्रोध को मन में नहीं आने दें. मेहंदी का औषधीय गुण इसमें महिलाओं की मदद करता है. सुहागन महिलाएं प्रकृति की हरियाली को अपने ऊपर ओढ़ लेती हैं. नयी दुल्हनों को उनकी सास उपहार भेजकर आशीर्वाद देती है. कुल मिलाकर इस व्रत का महत्व यह है कि सावन की फुहारों की तरह सुहागन महिलाएं प्रेम की फुहारों से अपने परिवार को खुशहाली दें और वंश बढ़ाए.

भूलकर भी ना करें हरतालिका तीज के दिन यह काम 

हरतालिका तीज व्रत के दिन जो गलत‌ियों हो जाती हैं, उसकी सजा का भुगतान अगले जन्म में करना पड़ता है. इसलिए इस व्रत में महिलाओं को बेहद सावधानी रखना पड़ती है. भविष्य पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है. इस दिन व्रत रखनेवाली महिलाएं और युवतियों को पूरी रात जागना होता है. पूजा करनी होती है. यदि कोई महिला व्रत के दौरान सो जाती है, तो वह अगले जन्म में अजगर के रूप में जन्म लेती है. हरिताल‌िका नर्जला व्रत होता है. इस दिन व्रत के दौरान कोई महिलाएं या युवतियां फल खा लेती है, तो उसे अगले जन्म में वानर का जन्म मिलता है. ऐसी मान्यता है. हालांकि, इस दिन कुछ खाने-पीने का प्रतिबंध माना गया है. फिर भी कोई महिलाएं यदि व्रत के चलते शक्कर का सेवन कर लेती है, तो वह अगले जन्म में मक्खी बन जाती है. इस व्रत के दौरान 24 घंटे जल की एक भी बूंद नहीं पी जाती है. फिर भी कोई युवतियां या सुहागिन महिलाएं जल पी ले, तो वह अगले जन्म में मछली बनकर जन्म लेती है. जो महिलाएं या युवतियां इस दिन व्रत नहीं रखती हैं, उसे अगले जन्म में मछली का जीवन मिलता है. इसके अलावा शेरनी भी यदि इस दिन मांस-मछली का सेवन कर लेती है, तो उसे भी इसका श्राप मिलता है. हरितालिका व्रत का महत्व जानते हुए भी कोई सुहागिन महिलाएं या युवतियां इस व्रत के दौरान यदि दूध पी लेती है, तो वह अगले जन्म में उसे सर्प योनी मिलती है.