पासवान-मांझी-सहनी संकट से जूझेगा महागठबंधन, लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव पर भी असर

बिहार में विपक्षी एकता के लिए होने वाली बड़ी बैठक से पहले नीतीश मंत्रिमंडल से एक इस्तीफे ने 2024 के लोकसभा चुनाव और 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का गणित बदलने का संकेत दे दिया।

स्वभाव से भारतीय जनता पार्टी को अगड़ों की पार्टी कहा जाता है, हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में समीकरण काफी बदला है। दूसरी तरफ, राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादवों को एकजुट करने के लिए जाने जाते हैं तो जनता दल यूनाईटेड के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार कुर्मी-कोइरी को राजनीतिक ताकत दिलाने के लिए। ऐसे में, लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक दिवंगत रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान, जदयू से अनुसूचित-जनजाति का चेहरा लेकर निकले पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी और सन ऑफ मल्लाह मुकेश सहनी की तिकड़ी जिसके साथ हो, उसके लिए 2024-25 के चुनावों में राहत होगी। विपक्षी दलों को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना में जुटा रहे हैं। इस बीच यह तीनों ही एनडीए से बाहर रहते हुए ही महागठबंधन के लिए मुसीबत बनते दिख रहे हैं। इन्हें एनडीए किस तरह स्वीकारती-संभालती और भुनाती है, यह मायने रखेगा।

चिराग पासवान तो नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान जैसा जख्म किसी ने नहीं दिया। विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी जदयू चिराग पासवान के कारण ही बनी। राजद ने उसे जितनी चोट नहीं दी, उतनी चिराग ने दी। भाजपा का साथ छोड़ राजद के साथ वापस लौटने की उनकी एक वजह चिराग भी थे। सबसे बड़ी वजह कहें तो भी गलत नहीं होगा। भाजपा ने अपनी बात पर कायम रहते हुए चिराग को अबतक इज्जत नहीं लौटाई, फिर भी जमीनी स्तर पर देखें तो नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलने वालों में वह भाजपा के भी नेताओं को पीछे छाेड़े हुए हैं। पटना लगातार आ रहे हैं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हर बात का जवाब दे रहे हैं। नीतीश भले ही उनका नाम नहीं लेना चाहें, लेकिन कई बार दिवंगत रामविलास पासवान से नजदीकियां जताते हुए चिराग का नाम लिए बगैर उनपर कटाक्ष कर चुके हैं। मतलब, मायने तो रख रहे चिराग। अब बारी भाजपा की है। नीतीश से दूर हुए समय बीत गया है और चुनाव अब सामने है। भाजपा अगर चिराग का सम्मान लौटाती है तो उसे रामविलास पासवान के नाम का वोट मिल सकता है।

जीतनराम मांझी की पार्टी को फायदा भी उधर ही 
जीतनराम मांझी के बेटे संतोष सुमन उर्फ संतोष मांझी एमएलसी हैं। मई 2024 तक बने रहेंगे। जब एमएलसी बनाना था, तभी जदयू ने शर्त रखी थी कि हम का विलय करा दिया जाए। तब भी बात नहीं बनी और अब बात बिगड़ी भी तो इसकी मुख्य वजह पार्टी का अस्तित्व ही है। पार्टी का अस्तित्व इसलिए भी, क्योंकि जदयू से निकलते समय जीतन राम मांझी ने अनुसूचित जाति-जनजाति के नेताओं को अपने साथ रख लिया था। मतलब, जदयू से माइनस करने का प्रयास भी कह सकते हैं। इसके बाद जब नीतीश मंत्रिमंडल में संतोष मांझी मंत्री बने तो अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण का विभाग भी लिया। मतलब, फोकस में अनुसूचित जाति-जनजाति थी और है भी। मांझी पहले भी एनडीए का हिस्सा रहे हैं। तब दिवंगत रामविलास पासवान और जीतनराम मांझी के बीच अंदर-अंदर अनुसूचित जाति-जनजाति की बात पर ही टकराव था। अब चिराग से यह टकराव शायद नहीं हो और अगर ऐसी बात दिखे भी तो भाजपा को रास्ता निकालते चलना होगा। मांझी को पांच सीटें भले नहीं मिले, लेकिन भाजपा अनुसूचित जाति-जनजाति के चिराग से खाली बच रहे हिस्से को समेटने के लिए हम को इज्जत बख्शेगी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

सन ऑफ मल्लाह धोखा खाकर बैठे हैं, मगर किनारे हैं
विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के संस्थापक और सन ऑफ मल्लाह के रूप में प्रसिद्ध मुकेश सहनी भाजपा से धोखा खाकर बैठे हैं, लेकिन मायने यह रखता है कि वह किनारे पड़े हुए हैं। न तो महागठबंधन सरकार ने दुश्मन (भाजपा) के दुश्मन (वीआईपी) को अपने साथ रखा और न घावों पर मरहम ही लगाया। इधर, मुकेश सहनी भी शांति के साथ वक्त का इंतजार करते हुए यह संकेत देते रहे हैं कि उनका विकल्प खुला है। मतलब, वह भाजपा से मिले घाव को भूल सकते हैं। भाजपा ने विधानसभा चुनाव के समय उन्हें सीटें तो दी थीं, लेकिन उम्मीदवार अपने कैडर से दिए थे। इसके अलावा सहनी को एमएलसी की सीट भी ऐसी दी थी कि बीच में निकले तो मझधार में डूबेंगे। यही हुआ भी। भाजपा ने बाद में वीआईपी के विधायकों का विलय करा लिया और जब सहनी ज्यादा आगे-आगे करने लगे तो उनकी एमएलसी सीट को कायम रखने की जगह खत्म होने दिया। अब सहनी महागठबंधन के भी टारगेट में होंगे और भाजपा भी चाहेगी कि बिना शर्त आएं तो आ जाएं। अगर सहनी भाजपा में आए तो गैर-सवर्ण जातियों की गोलबंदी में किरदार होंगे।

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